रविवार, 3 मई 2009

शनिवार के इंतज़ार में


अकेले रात भर एक अजनबी शहर में
मेरी याद तेरे सिरहाने बैठकर
तुझे जगाये रखती है........
हर पल ,पल पल
करवट बदल कर
खामोश बंद निगाहों से

ताका करते हो अपने सिरहाने
कुछ
कहते भी नही बनता
चुप रहते भी नही बनता
दिल में
उठती है सो सो आहे
अब उस से कैसे कहे........
बस सोचा करते हो .....
मेरी देह गंध.जब तारो ताज़ा सी
तुम्हे अपनी साँसोंमें
महसूस होती है
मेरी हर अदा एक चलचित्र सी
तेरी आँखों से गुजरती है
मन की गह्रइयो तक सोचते तुम
तुम तब मुझे पा लेते
हो
अपने अन्दर तक
मुझ पे चाह
जाते हो
और बेसुध होकर सो जाते हो
अब तुम ही सोचो
तुम्हारे इस शहर में
रात भर अकेले में
कैसे रात भर ताका करती हु
तुम्हारा सिरहाना
सिर्फ़ शनिवार क इन्तजार में...........................
............................................
निविया नीलिमा


5 टिप्‍पणियां:

  1. Ek khwab ham apne bhitar jeetey hein ,ek khwab kisi aur key bhitar ugata hey ! Aapki khubi yeh hey ki aapne apne bhitar key khwab mey Uskey ugate khwab ko jivit kar liya hey ! Khwab to khwab hi hey par aapne iss kavita ko najuk moud dey kar kaffi sanjeeda bana diya hey !
    Aapko mubarakbad !
    Bahut achcha likha hey ji !

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  2. उफ्फ्फ्फ्फ्फ निविया जी बहोत दिल की गहेराई
    से लिखा है..जैसे चलचित्र की तरह एक इन्सान के मनोभाव आखों के सामने से जा रहे थे...बहोत दिल को छु जाने वाली बात...लिखी है आपने...

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  3. neelima ji bahut behtreen kavita kissi ki yaad mein aur kissi ke intzaar mein... dil ko chhoo gai !

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