बुधवार, 23 मई 2012

मेरे मन है कितना सच्चा मेरे मन है कितना सच्चा
रहता है इस में एक बच्चा
बचपन कब का छूट गया
केशोर्य भी तो रूठ गया
आज भी यह मचलता है
जब भी होने लगती है जिन्दगी बदरंग
करने लगता है हुढ़दंग
...........
सपने अपने अब अपने कहा रहे
अपने भी अपने अब अपने कहा रहे
में वोह भी नही जो रही थी कभी
बदल गयी है दुनिया मेरी सभी
आँखे बंद करके देखा करती हु नवरंग
जब मेरा बचपन करता था हुढ़दंग
.............
जी लेते है हम जिन्दगी अपनी
बच्चे की मानिद
जब पाते है गोदी में
एक अपना सा बचपन
खुश होकर तालिया
बजा कर
कूकता है तब
मेरे अंदर का बच्चा
पूरे होते है सपने उसके सतरंग

मेरे अंदर का बच्चा
करता है तंग

अंदर ही अंदर करता है हुड़दंग ।:))))))))))))))))))))))


1 टिप्पणी: