गुरुवार, 14 जून 2012


निर्निमेष अंखियो से तकती  में
 बार बार
 बारम्बार
 दिन रात
 हर बार

बेचैन सी
 हर करवट बदलती
 झाकती हुए अपनी
 चेहरे की  झुर्रियो से


 तेरी एक बूँद को  तरसती
 अरे ओ आसमा मेरे

में
  सहरा बनी हु
प्यास है तेरी
 याद करती हु
 बंद पलकों में
 तेरी अनवरत,
तृप्त करती
प्रेम सुधा सी
बूंदों को

 जी लो लूंगी में
 मर मर कर
 तेरे बिन
 पर जानते हो तुम
 तुम बिन प्रजनन
 नही होगा
 सो
 बरस जाओ मुझे पर
 मिटा दो आग
मेरे सीने में धधकती है जो
बहुत दिखा लिया तुमने रोष
 देखो अब आंसू सुख  गये है
 सब रित गया है भीतर मेरे

.
 में माँ हु धरती माँ

 कैसे सृष्टि बचेगी तुझबिन
 नही पूरण
ओ पूरक मेरे तुझ बिन .
 अब तो बरस जा
 मेरे  मेघ मल्हार ............................................... नीलिमा शर्मा

5 टिप्‍पणियां:

  1. एक सुन्दर कविता... आपकी सबसे सुन्दर कविताओं में से एक... संवेदनशील और मधुर...

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  2. कैसे सृष्टि बचेगी तुझ बिन
    नही पूर्ण
    ओ पूरक मेरे
    तुझ बिन .....
    बहुत प्यारी सी रचना... धरती की प्यारी सी पुकार बरस जा मेघा ... भींगा दे मेरा तन-बदन !!

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