सोमवार, 16 जुलाई 2012

लौट आओ




लफ्जों के कोलाहल में
सांसो का सन्नाटा है
समंदर सी गहराई भीतर
भावनाओ का ज्वार-भाटा है

ख़ामोशी पसरी है चारो और
बस डूबते तारे के धड़कने की आवाज़
मधुर संगीत की तरह..,
सुगंध लिए ..उसकी . मेरा मन
अजन्मी अतृप्त इच्छाएं भी

कशमकश में अटकी हुई.....
याद के धागे बनाकर
हर एक लम्हा..
बुनती हु उसकी स्वेटर
हवाए भी खटखटा रही है
मेरे मन का सूना ,
अनदेखा वोह कोना ....................

........
सुनो न लौट आओ .
बहुत होते है 15 दिन!!


3 टिप्‍पणियां:

  1. suno na
    laut aao
    bahut hote hain
    pandrah din:))
    .
    bas itne shabd khafi de is rachna ke liye
    apne me paripurn thi ye rachna...:)
    waise shandaar:)

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  2. वाह...
    बहुत सुन्दर....
    मन से पुकारा है.....आते ही होंगे...
    :-)
    अनु

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