रविवार, 11 नवंबर 2012

Deewali ka shagun

होंठो से रिसता  खून
 सूनी  आँखे 
 लहराती सी चाल 
 बिखरे से बंधे बाल 

बनीता 
आँगन लीप रही हैं 

 
 आज धनतेरस हैं 
 किसनू  लोहे की 
 करछी खरीद लाया हैं 
 शगुन के लिए 


 आते ही उसे
घर की लक्ष्मी पर
 अजमाया हैं 

 बनिता की माँ  ने 
 पहली दीवाली का 
 शगुन 
 नही भिजवाया हैं 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    त्यौहारों की शृंखला में धनतेरस, दीपावली, गोवर्धनपूजा और भाईदूज का हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  2. संवेदनशील प्रस्तुति - दीपोत्सव की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

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  3. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .
    बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति...
    मंगलमय हो आपको दीपो का त्यौहार
    जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
    ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
    लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

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  4. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  5. जितनी भी तारीफ करूंगी वो कम ही रहेगी नीलिमा जी,आशा है आप इसी में सबकुछ समेट लेंगी।

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