सोमवार, 26 नवंबर 2012

Maa

मूक अवाक् निशब्द  माँ 
 और उसके सामने
 उसकी अपनी जायी  संतान 
  

 बूढ़े कापते हाथो से आज 
 कीमती कांच की बरनी छूट गयी 
 चुपके से लड्डू निकलते हुए 
 अपने और अपने पोते के लिए 



 बहु की जुबां और बेटे के हाथ 
दोनों का वार चुभ गया 
 आग लग गयी सीने में 
 पानी आगया आँखों में 


आंसू  का सबब 
बेटे के हाथ उठने की  
शर्म से था या 
 बरनी के टूटने के 
अफ़सोस से 
 या लड्डू न मिलने से 

 पोता अभी तक सोच 
रहा हैं .दादी के उंगुली थामे 
 चुपके से बालकोनी में ..........................Neelima sharma

7 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक...
    यही जिंदगी है...
    बहुत कुछ ऐसा होता है , जो अफसोसजनक ही कह सकते हैं..

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  2. बहुत ही मार्मिक .... :'(

    पढ़ कर रोगटें खड़े हो गए :(

    हकीक़त में जिस पर गुजरती होगी ,उन्हें कैसा लगता होगा ,मैं कल्पना भी नहीं कर पा रही !!

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  3. क्या जिंदगी ऐसी भी होती है ????

    अगर हां तो ...हम शर्मसार है अपनी इस पीढ़ी के संस्कारों से और उनको दी गई शिक्षा से|

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  4. बहुत मार्मिक... शर्म आती है ऐसी संतानों पर...

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  5. आज की दुनिया का सच
    बहुत मार्मिक...
    नीलिमा जी मेरी एक योजना है. मेरे ब्लॉग पर आइए और अवगत कराइए....

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