मंगलवार, 15 जनवरी 2013

Aaina

kitni ajnabi si hu mai
कितनी अजनबी सी हूँ मैं 
khud hi khud se
खुद ही ,खुद से 
pahchaan hi nhi paati hu mai
पहचान ही नही पाती हूँ 
ki mai hi hun ye ?
कि मैं ही हूँ यह ?
Jab bhi apne ko 
जब भी अपने को
aaine k saamne paati hu…………
आईने के सामने पाती हूँ ......
kitne sapne kirche ban jaate hai
कितने सपने किरचे बन जाते हैं
kitne hi yatarth tab samne aate hai
कितने ही यतार्थ तब सामने आते हैं
kitne hi kahkahe peecha karte hai
कितने ही कहकहे पीछा करते हैं
tab sab bhul jati hu mai
तब सब भूल जाती हूँ मैं
AAINA is kadar ,kyo ?
आईना इस कदर , क्यों?
ik anjaan ,ajnabi se
एक अनजान , अजनबी से
chehre ko NIVIA bana kar
चेहरे को नीलिमा बना कर
mere samne khara kar deta hai
मेरे सामने खड़ा कर देता हैं
k mai pahchan hi nhi paati
कि मैं पहचान ही नही पाती हूँ
KE YE MAI HI HU…………………..
कि यह मैं ही हूँ :(
नीलिमा शर्मा

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