शनिवार, 5 जनवरी 2013

कोसी कोसी धूप 
मेरे शहर की 
कोहरे की चादर 
तेरे शहर में 
फिर भी लहजे 
सर्द हैं सबके
क्यों ना ओढ़ ले
गरमजोशी की चादर
अहसासों में / लफ्जों में
सुना हैं .......
रिश्तो में
बर्फ सी जमने लगी हैं . नीलिमा शर्मा
kosi kosi Dhoop
Mere Shahar ki
Kohre ki chadar
Tere shahr mei
Fir bhee
lahze
sard hain sabke
kyu na oudh le
garam joshi ki chadar
ahsaso mei / lafzo mei
Suna hain
Rishto mei
Burf see jamne lagi hain . neelima sharma

3 टिप्‍पणियां:

  1. रिश्तों की बर्फ को गर्मजोशी की चादर से पिघलाकर बहाना जरुरी है - सटीक प्रस्तुति

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  2. बहुत मर्मस्पर्शी रचना ...

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