शनिवार, 20 अप्रैल 2013

माँ तुम्ही बताओ मेरा क्या दोष था


गुडिया !!!!
तूने छोटे कपडे पहने थे क्या?

या तुम देर रात घूम रही थी

अपने पुरुष मित्र के साथ

या

तुम्हारे हाव भाव

और हरक़ते

बना रहे थे कामुक

तुम्हारे अंगो को


ऐसा कुछ भी तो
नही किया तुमने
मेरी बच्ची !


फिर क्यों उस मर्द
नामक कीड़े की
मर्दानगी जागी


सवाल परेशान किये हैं मुझे

कैसे सिखाऊ मैं अपनी बेटी को
ऐसे दरिंदो को पहचान'ना

तुझे तो किसी ने
मिर्च की पुडिया भी
नही थमाई होगी !!!! neelima
 



2...........कुछ भी नही होगा यूँ रोने से
तैयार रहो
अब गुडिया को खोने से

मातम मनाओ या
मोमबत्ती जलाओ

हल होगा बस मसला
खुद के सभ्य होने से


आग लगा दो दुनिया को
या शोर मचा लो संसद में
बस गर्व न करो तुम
खुद के मर्द होने में

कुछ भी नही होगा यूँ रोने से
तैयार रहो
अब गुडिया को खोने से ........नीलिमा

3...
हद्द है न !!!!
मैं क्यों स्यापा कर रही हूँ पहले निर्भय के साथ जो हुआ तब भी ,
आज गुडिया के साथ हुआ तब भी ....... मेरी कोण सी कोई बेटी हैं जो मैं स्यापा करू . जो मैं असुरक्षित महसूस करू .हुह्ह्ह .


क्या करू पत्थर नही हूँ मैं !!!! और चाहती हूँ जोर से चीखना !!!!!!!!! आखिर क्यों!!!!! और कब तक !!!!!!!!!!
 —



11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक प्रस्तुति...!
    साझा करने के लिए आभार...!

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  2. गहन अनुभूति
    आज के संदर्भ की
    विचारपूर्ण भावुक रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों

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  3. शुभ प्रभात
    मर्म को छू लिया आपने
    साधुवाद

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  4. Touching and timely... We need to go long way to make a fair and equal society...

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  5. कटु सत्य को कहती मार्मिक अभिव्यक्ति

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