मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

नन्ही चिरैया

हौले हौले कदमो से चलती 
मैं नन्ही चिड़िया 
तेरे घोंसले की 

उड़ना हैं मुझे 
छूना हैं अनंत
आकाश की ऊँचाई को

मेरे नन्हे पंखो में
परवाज नही
हौसला हैं बुलंदी का

भयभीत हैं अंदरूनी कोन
आकाश भरा हुआ हैं
बड़े पंखो वाले पक्षियों से

सफ़ेद बगुले ही अक्सर
शिकार करते हैं
मूक रहकर

माँ मैं

नन्ही चिरैया
कैसे ऊँचा उड़ पाऊंगी
इन भयंकर पक्षियों में

मैं कैसे पहचानू ?
यह उड़ा न के साथी
या दरिन्दे मेरी जात के

आसमा से कहो
थोडा ऊँचा हो जाये
मुझे उड़ना हैं अन्तरिक्ष तलक........Neelima

18 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद गहन भाव लिये ... मन को छूती पोस्‍ट
    आभार

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  2. बेहद गहन और संवेदन शील रचना सखी .........

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  3. आज की ब्लॉग बुलेटिन बिस्मिल का शेर - आजाद हिंद फौज - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. ऊँची उड़ान की बुलंद अभिलाषा
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post बे-शरम दरिंदें !
    latest post सजा कैसा हो ?

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  5. शुभ प्रभात
    सफ़ेद बगुले ही अक्सर
    शिकार करते हैं
    मूक रहकर
    एक मूक कटाक्ष
    सुन्दर पंक्ति

    सादर

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  6. आज सच ही किसी पर भरोसा नहीं .... उड़ान के साथी ही पंख कतार देते हैं .... मार्मिक अभिव्यक्ति ...

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