मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

बाल मजदूर


हम ढोते हैं ईंटे तुम्हारे मकानों के लिए
रोटी के टुकडो और चंद कतरों तन के लिए
हमारे आंसू भी बिखरे हैं इसकी नींव में
पैसा बहाते हो तुम हमारे पसीने के लिए
चाहे जितना शोर मचहा लो संसद से सडको तलक
लोग हमको रख ही लेंगे नौकर पैसा बचाने के लिय
मेरी बहना भी रोती हैं जब बोझा सर पर ढोती हैं
गुद्दिया भी उसकी तड़पती हैं खेल खिलाने के लिए
हम भी हक चाहिए रोटी/ कपडा और पढाई का
क्यों पाया जन्म हमने
बाल मजदूर बन जाने के लिए....Neelima sharma

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही मार्मिक रचना आदरणीया चित्र को देख ही मन भर आया उस पर आपकी रचना एकदम सही एवं सटीक है. हार्दिक बधाई

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