रविवार, 26 मई 2013

andhere or tum

तुम को पता है न
 मुझे अँधेरे से दर लगता हैं
 काली राते  मुझे सताती हैं
 स्याह अँधेरा मुझे समेट  लेता हैं
अपने भीतर पंजो में दबोचकर
 और मैं डर  कर
 छिप जाती थी तुम्हारी आगोश में



 आज मैं अकेली हूँ
निपट अकेली
स्याह अँधेरे हैं अमावस   के
जो मुझे खिंच रहे हैं
 अपने भीतर
 मैं चीख रही हूँ
 बेहताशा
पर कोई सुन नही पता मेरी आवाज़ को


 तुमने तो कहा था
 तुम दोजख तक मेरा साथ दोगे
 मेरे दमन मे लगी आग बूझो दो गे

 आज मैं घिरी हुयी  हूँ इस दुनिया में
 आवाजों/तानो/तंजो उलाहनो में
 कसूरवार हूँ बेकसूर होकर भी


   और तुम!!!

तुमने मुझे अँधेरे में रखा
अब
  मुझे अंधेरो की आदत होने लगी हैं
  मैंने तो सिर्फ मोहब्बत की थी उजाले से
 तुमने तो अँधेरे से भी बेवफाई की हैं ......

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज सोमवार (27-05-2013) के
    सोमवारीय गुज़ारिश :चर्चामंच 1257 में मयंक का कोना
    पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए बुधवार 29/05/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. बहुत खूब रचना |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  4. अंधेरे अक्सर डराते हैं ...
    एहसास लिए रचना ...

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