बुधवार, 15 मई 2013

खंगाल रही हूँ

खंगाल रही हूँ  पुराने पन्ने 
 अपनी लिखी 
 डायरी के 
 पुराने पन्ने
जिस पर 
कई बार कडवाहट 
 कई बार झुंझलाहट 
 उड़ेली थी मैंने 
 अक्षरक्ष 
 जब तब 
 कुण्ठित /
अवसादित 
 हो कर
रंगा  था मैंने 
अकेलेपन में 

 फाड़ डालना हैं 
अब उन पन्नो को  
  बिना  दुबारा -तिबारा पढ़े 
भूल जाना हैं  
उन उदास पलो को 


 सुनो न 

 नयी डायरी लेनी हैं 
 जिन्दगी को नए सिरे से लिखना हैं 
मुझे प्रेम की स्याही से  ................नीलिमा शर्मा 

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (17-05-2013) के चर्चा मंच 1247 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन क्या आईपीएल, क्या बॉस का पारा, खेल है फ़िक्स्ड सारा - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. जिन्‍दगी को नये सिरे से लिखना ... अच्‍छा है ये ख्‍याल भी
    शुभकामनाएँ
    सादर

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  4. जीवन को नये सिरे से लिखा जाना चाहिये
    सृजन की नयी बात कही है
    सार्थक,सुंदर रचना
    बधाई
    आग्रह इसे भी पढ़े "बूंद"

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