मंगलवार, 28 मई 2013

मैं एक प्रश्नचिन्ह सी

मैं एक प्रश्नचिन्ह  सी
सामने खड़ी रहती हूँ
तुम्हारे
 और तुम
मेरे हर प्रश्न का उत्तर बन
 बाँहे  पसार  देते हो
और समेट   लेते हो
 मेरे सारे अंतर्द्वंद को
 अपनी भीनी सी महक
और मुस्कराहट में

 और मैं  हर सुबह
 नए पश्नो  संग
तुम्हारे सामने होती हूँ
खुशकिस्मत सी
और तुम बिना थके
 बिना किसी उकताहट के
मेरी जिज्ञासाए
शांत करते हो


 सुनो न ....
 मेरे प्रश्न सिर्फ तुम्हारी
नजदीकियों के  मुन्तजिर
होते हैं
किसी जवाब के नही
 मैं ..................नीलिमा




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