सोमवार, 9 सितंबर 2013

स्वीकारोक्ति एक पुरुष की

मेरे नाम से मुझे जब पुकारती हैं एक लड़की और तहाती हैं मेरे धुले हुए कपडे झुन्झुलाता हुआ मैं झिड़क देता हूँ अक्सर और तब भी खामोश रहती हैं बिना किसी उम्मीद के प्यार में होती हैं न वोह !!! और मैं उदास सा करवट बदलता हुआ याद करता हूँ सिर्फ एक जिस्म जिस्म जो दिन रात \ मेरे इर्द गिर्द घूमता हैं एक निश्चित परिधि में बिना अपना ख्याल किये!!!! यह लडकियां कितनी कमजर्फ होती हैं कमबख्त होती हैं कितना भी दुत्कारो और फिर पुचकारो सावन की झड़ी सी बरसती रहती हैं बस एक पल के सानिध्य के लिय माँ कहती थी !!! लडकिया ख्याल भर नही होती एक उम्र भर होती हैं और इस एक उम्र में जी लेती हैं आने वाली सात उमरो को सिर्फ सात फेरो का खेल खेलकर पैरो के तले पर गुदगुदी से खिलकर हसने वाली लड़की रो देती हैं जरा सी बात अनसुनी करने पर और अक्सर लडकिया भूल जाती हैं बड़ी बड़ी बाते और सीने से लगा छोटी छोटी बाते घुलती रहती हैं / शक्कर सी राइ का पहाड़ बना रोती हैं/ लिपट कर पहाड़ जैसे मुसीबतों से पार पा जाती हैं /अक्सर चुपचाप सी दम्भी अहंकारी आजाद होने का नाटक करती अक्सर माँ सी पिघल जाती हैं ओर एक जायज माँ बन जाने को क्या क्या नही कर जाती लडकिया और बिस्तर पर पढ़ी सलवटो सी सहम जाती हैं पत्थर  
जो नही होती दिखने में
मोम की तरह सी
फिर भी बनकर
सख्त सी
 उम्र भर निभाती हैं
रिश्ता
 रिसता हुआ भी
 यह कमबख्त लडकिया
.Neelima Sharrma

16 टिप्‍पणियां:

  1. गहरी बात कहती कविता..... बहुत उम्दा

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  2. लड़की की जिन्दगी की कसमकस को प्रस्तुत करती रचना
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  3. बहुत अच्छी तरह से उभारा है एक अंतर्वेदना को

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  4. देव भी नहीं समझ पाए .... लड़की कब क्या कर जाए ...उन्हेंअगर जीत सकते हैं तो बस प्यार से ..... बहुत अच्छी रचना है :)

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  5. नारी के अंतर्मन को उभरता एक खुबसूरत रचना ...

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  6. बहुत गहरी बात लिखी नीलू... एक औरत की ज़िंदगी ...

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