मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

कहो तुम

कहो तुम 
जो अनकहा रह गया हैं 
मैं सुन रही हूँ 
वोह सब भी 
जो तुम कहकर नही 
कह पा रहे हो 
इतना ही तो फर्क हैं 
तुझ में ,मुझ में 
तुझे लफ्जों की जरुरत 
मुझे पढने के लिय 
मुझे सिर्फ तेरे सानिध्य की

सुनो
करीब से गुजर कर देखो
कल्पनाओ में भी
वोह सब भी पढ़ लूंगी
जो अभी सोचो
की परिधि में
आने को आतुर
होंगे भाव तुम्हारे ..................................... नीलिमा शर्मा Nivia

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