शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

एक जंग लगा पिन

एक जंग लगा पिन
 मुचड़े से कागज पर
 बिखरी हुयी चुडिया
आईने के सामने
मैली सी चादर
 बिछी बिस्तर पर
 यह बिखरे कपडे
 उसके पैताने

 एक भावात्मक
प्रतीकात्मक
 लिय  बेतरतीब फैली
 यह  चूड़ियाँ, चादर
 कपडे और झूठे बर्तन
बयानी करती हैं
तुम्हारे अनकहे अहसासों की

 तुम आजकल तनहा हो
 तन से भी मन से भी
 भावो और ख्यालो से भी


 तुम्हारे पास नही हैं आजकल
 तुम्हारी प्रिय "निविया "
 तुम्हारे दिल में उसकी यादो ने
इतना गहरा असर छोड़ा हैं
 और तुमने  
उसकी उतारी चूड़ियों को
 उसकी बिछाई चादर को
 उसके लिखे कागज को
 उसकी सब यादो को
बस बस ऐसे ही रख छोड़ा हैं
...............
 नीलिमा शर्मा  निविया 

13 टिप्‍पणियां:

  1. वाह... गहरी बात... गहरे जज़्बात...

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  2. वाह ,दर्द बयाँ करती कविता

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  3. हाल -ए- दिल बयाँ करती रचना

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-10-2013) "शरदपूर्णिमा आ गयी" (चर्चा मंचःअंक-1403) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    उत्तर
    1. शुक्रिया शास्त्री जी ....आपकी हौसला अफजाई से मनोबल उच्च होता हैं

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  5. गहरे जज़्बात....दर्द बयाँ करती रचना

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