मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

यूं ही चलते चलते

बेवज़ह एक नज्म बन जाती हैं .
जब जब तुम मुझसे मुखातिब होते हो 
लफ्ज़ भी गुनगुनाने लगते हैं संगीत 
जब जब तुम मुझे अपनी कह जाते हो
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जैसे दिया हो किसी पीर ने रूहानी तागा ऐसे 
या मिला हो प्रसाद में एक चमकता सिक्का जैसे 
या गिरजे में जलती मोमबत्ती की सी लो सी 
माँ तेरा वजूदइस कदर मुझ में घुल गया कैसे
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कुछ लोग चुप हैं .....शोर मचाकर 

कुछ लोग शोर मचा रहे हैं ...चुप रहकर 

बगावत जारी हैं .ताकि सनद रहे ................
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कुछ भी नही !!!

फिर भी 

बहुत कुछ !!!

भीतर भीतर चलता हैं ............. 


अनचाहे ही ...अनजाने ही ...
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उम्र भर 
उम्र की चाह की 
पल भर में 
पल की उम्र फ़ना 
अब उम्र लघु 
या पल दीर्घ 
पसोपेश में 
आदमी !!!!! neelima
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6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना की ये चन्द पंक्तियाँ.........

    उम्र भर
    उम्र की चाह की
    पल भर में
    पल की उम्र फ़ना
    अब उम्र लघु
    या पल दीर्घ
    पसोपेश में
    आदमी !!!!!

    बुधवार 09/10/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    को आलोकित करेगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (09-10-2013) होंय सफल तब विज्ञ, सुधारें दुष्ट अधर्मी-चर्चा मंच 1393 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. जीवन के अलग अलग रंगों को एकत्रित किया ही ... बहुत खूब ...

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