मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

यतार्थ /पलायन

तुम्हारी इन दो आँखों में
झाँकने की हिम्मत
कभी नही हुए थी मेरी
ओर, आज
अब वही मैं हूँ
झांक रही हु .
देख रही हूँ इनमे
अपने दो अस्तित्व
यतार्थ और पलायन के बीच
आंदोलित
अपने ही दो अस्तित्व
एक जो जान रहा है
जीवन के सत्यो को
और दूसरा जो भाग रहा है
इसकी दुश्वारियो से
मैं निर्निमेष तुमको
तकती हु कुछ पल तक
और फिर झुका लेती हु अपनी पलके
तब मुझे ज्ञान होता है
अपने एक नए अस्तित्व का
जो मेरा व्याक्तितव है गोया
जो यतार्थ और पलायन के
मध्य दोलन कर रहा है
मैं हौले से
पलके उठाकर देखती हु
मेरा यतार्थ अस्तित्व
स्मित मुस्कान से
सोचता है तब
जीवन एक संघर्ष का नाम हैं
उठ! सामना कर!!
तू कमजोर नही !!
पर तभी
पलायन अस्तित्व फुफकारता है
तुम इन सब के लिए नही बनी
जिजीवषा और मृग तृष्णा की लढाई
तुम क्यों लड़ो

यतार्थ और पलायन की इस चक्की में
पिसती हुए मैं
सोच रही हूँ अक्सर विमूढ़ सी
किसके हवाले करू खुद को
यतार्थ मुझे अपनी और खिंच रहा है
पलायन मुझे अपनी और
मैं किमकर्ताव्य विमूढ़ सी
सोचो में गम हूँ
कि अब क्या हो / करूँ
तभी तुम अपनी दोनों आँखे बंद कर लेते हो
और विलीन हो जाते है
मेरे दोनों ही अस्तित्व
तब रह जाता है
यह मेरा अधुरा सा व्यक्तित्व
और छूट जाता है जहन पर एक बोझ
यतार्थ और पलायन का बोझ .............
इस उम्र का बोझ
उम्र भर का बोझ
ताउम्र का बोझ ............ नीलिमा शर्मा


साँझा काव्यसंग्रह " एक साँस मेरी " से

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