सोमवार, 3 मार्च 2014

बस सात फेरे और तुम मेरे



बस सात फेरे 
और तुम मेरे 
कितना आसान हैं ना 
यूँ किसी का हो जाना 
पर एक उम्र भी कम होती हैं 
किसी का पूरी तरह हो जाने में 
बरसो तक का साथ 
फिर भी अजनबियत सी रहती 
और कभी एक पल 
उम्र भर को जोड़ देता हैं 
बिना सात फेरे लिय भी

एक स्त्री उम्र भर देती हैं पुरुष को संबल
फिर भी निकाह टूटे हैं आखिर क्यों ?
एक पुरुष खुद को भूलकर
बना लेता अजनबी का अपना सर्वस्व
फिर भी घरो में कटुता क्यों

विवाह ,परिणय निकाह
सब समाज के बनाये घेरे हैं
संबंधो के एक परिधि में रखने के
न स्त्री इस रेखा को पार करे
न पुरुष इस रेखा के भीतर
किसी अन्य के साथ प्रवेश करे
तभी सार्थक हैं
निकाह का कुबूल होना
अग्नि का साक्षी होना

आज विवाह बदल रहे हैं
कल तेरे आज मेरे होने में
आज निकाह तीन लफ्जों से
बदल रहे हैं उमरभर रोने में

आज स्त्रिया पछाड़े मार कर नही रोती
आज पुरुष रोनी सूरत बनाकर कतल नही करते किसी का
आज जश्न मनाया जाता हैं चाहे के अनचाहे हो जाने पर
फिर भी
विवाह ,परिणय ,निकाह
समाज की धुरी हैं और होते रहेंगे
और हम यु ही कभी ख़ुशी से
कभी उदासी से
इन रिश्तो को ढोते रहेंगे
ढोते रहेंगे ............
नीलिमा शर्मा निविया









आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर लिखा नीलिमा ....बधाई

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन ट्रेन छूटे तो २ घंटे मे ले लो रिफंद, देर हुई तो मिलेगा बाबा जी का ठुल्लू मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (04-03-2014) को "कभी पलट कर देखना" (चर्चा मंच-1541) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. एक रीत जो समाज, बल्कि पूरी दुनिया में बनी हुई है वो तो रहेगी ... उसको भेदना बहुत ही मुश्किल है ... रिश्तों को इसलिए प्रेम से, आस्था से, विश्वास से संजोना जरूरी है ...

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  5. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट (DREAMS ALSO HAVE LIFE) पर आपके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद।

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  6. और हम यु ही कभी ख़ुशी से
    कभी उदासी से
    इन रिश्तो को ढोते रहेंगे
    ढोते रहेंगे ....
    ---- बस यह अहसास , यह सोच ,यह समझ ..'ढोना'...ही सारे फसाद की जड़ है जी ....यदि इसेखुशी-खुशी 'जीना ' में बदल दिया जाय तो सब ठीक होजाता है ...और यह दोनों ओर का प्रयास है ....
    --- वर्तनी की अशुद्धियों का ध्यान रखें...

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