गुरुवार, 20 मार्च 2014

चुप्पिया





चुप्पिया
जब गूँज बनकर
दिमाग में धमकने लगे
और
खामोशिया भी
खुद से गुफ्तगू करने लगे
तब
मेरे लफ्ज़ 

मुझे राहत देते हैं
अनजाने में
अनचाहे शब्द भी
जब
कलम से निकलते हैं
कुछ
बहने लगता हैं भीतर
शायद
चुप्पी से जन्मा गर्दा
ख़ामोशी से पनपा लावा
अपनों पर बरसे
इसके पहले
उतार लेती हूँ
इन्हें
कागज के मासूम टुकडो पर
यह कागज के टुकड़े
जो बलि चढ़ जाते हैं
मेरे मौन की
और
बना जाते हैं मुझे
मजबूत
फिर से
लड़ने को अपने
एकांत से
मौन रहना
मेरी आदत नही हैं
नियति बन रही हैं
सुनो ना !
कुछ पल मेरे साथ रहो
कुछ मुझे पढो
कुछ पढ्वाओ
मुझे भी जीना हैं
तुम्हारे
प्रेमसिक्त शब्दों के शोर में .............नीलिमा शर्मा Nivia
 —

















आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

6 टिप्‍पणियां:

  1. सुनो ना !
    कुछ पल मेरे साथ रहो
    कुछ मुझे पढो
    कुछ पढ्वाओ
    मुझे भी जीना हैं
    सुंदर अभिव्यक्ति

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (21.03.2014) को "उपवन लगे रिझाने" (चर्चा अंक-1558)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  3. चुप्पिया
    जब गूँज बनकर
    दिमाग में धमकने लगे
    और
    खामोशिया भी
    खुद से गुफ्तगू करने लगे
    तब
    मेरे लफ्ज़ ............................बहुत सुंदर.

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  4. बहुत सुन्दर !
    स्वागत टिप्पणी को एक बार पढ़ लीजिये !
    latest post कि आज होली है !

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  5. उनकी क़िस्मत का सितारा, कैसा होगा यह लोग भला, क्या जाने..? उस डूबने बाले ने महफिल में, ना जाने किस किस को पुकारा होगा..?

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