शनिवार, 8 मार्च 2014

खुद पर अपने रखो विश्वास

आज फिर समूह में हंस रही हैं स्त्र्रियाँ
रंगबिरंगेपरिधानों में सजी
उम्मीदे के दामन थामे
एक दुसरे के गले लग रही है स्त्रिया

दूर गांव में उनकी सहोदारियाँ 
गांव की चोपाल से घर की दहलीज़ तक
अन्दर तक क्षत विक्षत हो रही हैं
अपने और अपनों के लिय

घर के भीतर पति से पिट कर आई
उनकी गृह सहायिका , लाल आँखों से
अपनी नीली देह को आँचल में छिपाती
खुश हैं अपने सुहाग चिन्हों के होने से

और गर्भ में पलती उनकी अजमी बेटी
गिन रही दिन अपनी मौत के
और स्त्रीया हंस रही हैं समूह में
महिला दिवस विश करके

दिन सिर्फ विश करने तक हैं
बड़े बड़े व्याख्यान तक बस
कमजोर खुद हैं स्त्री शक्ति
एक देह में मेहमान हैं बस

खुद पर अपने रखो विश्वास
अपने अन्दर भरो साहस
लड़ना अपने अपनों से नही
मिटाओ कमी जो हैंतुम में ख़ास

.....................नीलिमा शर्मा निविया





आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह नीलिमा.....हर शब्द शब्द लगभग चीख़ता हुआ सा .....हाँ वाकई ....अपना हाथ जगन्नाथ ..!!!

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