सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

काले घेरे

रात का सन्नाटा 
गूंज बनकर 
अक्सर 
सताता हैं 
तब तब 
जब जब
यादो के गठ्ठर
आँखों के
इर्द-गिर्द
कालिमा बनकर
लटकने लगते हैं
और सुबह उठकर
झूठ बोला जाता हैं
बस वक़्त से सोये थे
अचानक नींद टूटी
फिर हम जागते ही रह गयी
यह यादो के गठ्ठर
जब खुलते हैं तो
एक के साथ दूसरी याद
इस कदर उलझी मिलती हैं
जैसे
समंदर में
ढेर सारी सीपिया बिखरी हो
यह औरते रात भर जाग कर
कभी बुना करती थी
स्वेअटर और मोज़े
आज सपने बुनती / udhedhti हैं
अपने और अपने से जुड़े अपनों के
रातो का जागना कभी मज़बूरी नही होता
आदत बन जाता हैं
अक्सर
यादो के गठ्ठर तले दबकर
अब

काले घेरे देख आँखों के
किसी की , सोचना
यादो का कितना बड़ा जखीरा हैं
इसके पास
और रात का सन्नाटा
चोकीदार कीसीटियाँ
अक्सर
उसे संगीत सी लगती हैं
अपने एकांत में .....




आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

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