बुधवार, 17 दिसंबर 2014

गर्माहट लफ्जों की



उन लम्हों को कैसे भूल जाए 
जब एक एक फंदा 
सलाई पर बुनती थी 
तुम्हारा नाम लेकर 
ऊनी दुशाले 
और तुम उसे लपेटे रहते थे 
अपने चारो तरफ
दिसम्बर की धूप / कोहरे में भी
आज
ना मेरे पास
वोह ऊनी धागे हैं
न सलायिया
बस अहसास भरे हैं भीतर
अब बुनती हूँ उनसे
प्यार से भरे / भीगे
हर्फो का शाल
गर्माहट लफ्जों की मेरे
ऊनी धागों से कमतर तो नही ......................
नीलिमा शर्मा Nivia




आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 18-12-2014 को चर्चा मंच पर क्रूरता का चरम {चर्चा - 1831 } में दिया गया है
    आभार

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार, कल 21 जनवरी 2016 को में शामिल किया गया है।
    http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमत्रित है ......धन्यवाद !

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