बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

शादीशुदा प्रेम


तुम शादीशुदा मर्द भी कितने अजीब होते हो 
प्रेम अगर  हो जाए पत्नी से  तो
जमीन आसमान इक करते हो 
एकाधिकार तुम्हारा हैं इस दिल पर 
जानते हुए भी 
बार बार झांकते हो 
हर दरीचे की 
हलकी सी भी दरारों से
और नही छोड़ते
जरा भी गुंजाईश
ताका झांकी की
किसी और की
खाना कितना भी अच्छा हो
लफ्ज़ जुबान से नही
कभी आँखों की चमक से
तो कभी स्नेहिल स्पर्श से बयां करते हो
तुम शादीशुदा मर्द भी कितने अजीब होते हो
सज संवर कर जाए कही पत्नी
नीचे से ऊपर तक निगेहबानी करते हो
खुद किसी से भी बतियाते रहो
बीबी को अपनी आँखों के घेरे में रखते हो
सबकी नजरे पढने की कोशिश में
अपने सरमाये में उसे महफूज़ रखते हो
कमर या कंधे पर रखा तुम्हारा हाथ
कितना मजबूत करता हैं मनो बल
जानते हुए भी
सरे आम दो कदम दूर से बात करते हो
तुम शादी शुदा मर्द भी कितना अजीब होते हो
उम्र के हर मुकाम पर
बदल जाते हैं तुम्हारे तौर तरीके
प्यार जताने के लहजे
आँखों के नीचे के काले घेरे
उड़ते सफ़ेद होते बाल
घुटने के दर्द से बदलती चाल
मोटी ड्राई होती शरीर

की खाल
फिर भी बीबी को गुलाब लगते हो
तुम शादीशुदा मर्द भी कितना अजीब होते हो
प्यार के इज़हार में मुफलिस से
लाखो की भीड़ में अपने अपने
बच्चो के भविष्य के जदोजहद करते
बीबी की नज़रे बचाकर माँ की मुट्ठी भरते
बहन की हर आह पर सिसकते
निशब्द जिन्दगी जीते हुए
अपने लिय न सोच कर
बीबी के झुमके लिय के साल भर
ऑफिस में फाके करते हो
तुम शादी शुदा मर्द भी कितना अजीब होते हो
प्यार मोहताज नही होता  तारीखों का 
 अक्सर भूल जाया करते हो 
 कभी गुस्ताखी  हो भी जाए  
तुम्हारी प्यारी जिन्दगी से 
मुआफ दिल से करते हो 
फाकाकशी के दिन हो  या  व्यस्त  तारीखे हो 
 प्रेम की स्वप्निल दुनिया की सैर करते हो 
 इक बार का समर्पण  
उम्र भर की जरुरत 
 अग्नि को साक्षी मान वादा करते हो 
तुम शादी शुदा मर्द भी कितना अजीब होते हो
प्यार का इज़हार लफ्जों से नही
अपने स्नेहिल स्पर्श और आँखों की चमक से करते हो ..................... नीलिमा शर्मा

























आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (13.02.2015) को "भावना और कर्तव्य " (चर्चा अंक-1888)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. हर मर्द और औरत की अपनी अपनी खासियत ........ अपना अपना वजूद !!
    इतने शानदार शब्दों के लिए बधाई

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  3. बहुत ही प्यारी और दिल को छूने वाली कविता...

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  4. सही कहा जी। प्यार " अगर " हो जाये तो !!
    बहुत बढ़िया .....:)))

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  5. .....बस और क्या चाहिए ...यहाँ न बनावट है ....न खुद को बात बात पर जताने की ज़रुरत ......यहाँ सिर्फ प्यार है ..आपसी समझ है ..........यह समझ सदा यूँहीं बने रहे...

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  6. प्यार हो जाए तब तो बात ही क्या है ... !

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  7. कितनी ज़रुरत है तुम्हारी
    जानते हो तुम ?
    नहीं जानते ना ...
    मेरे अहम् को पोसते हो
    अनजाने ही
    सुरक्षा कवच बनकर...
    तुम्हारी उपस्थिति
    मेरी कमजोरियों का आवरण
    जैसे मेरा लौह पोश हो तुम
    सप्तपदी के मायने नहीं जानती
    पर हम चले साथ ही
    लड़ते झगड़ते रूठते मनाते
    मेरे साथ ही रहना
    मेरी ढाल बनकर
    मुझे सच में तुम्हारी ज़रुरत है
    जान लो और मान लो .

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  8. कितनी ज़रुरत है तुम्हारी
    जानते हो तुम ?
    नहीं जानते ना ...
    मेरे अहम् को पोसते हो
    अनजाने ही
    सुरक्षा कवच बनकर...
    तुIम्हारी उपस्थिति
    मेरी कमजोरियों का आवरण
    जैसे मेरा लौह पोश हो तुम
    सप्तपदी के मायने नहीं जानती
    पर हम चले साथ ही
    लड़ते झगड़ते रूठते मनाते
    मेरे साथ ही रहना
    मेरी ढाल बनकर
    मुझे सच में तुम्हारी ज़रुरत है
    जान लो और मान लो ....

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