बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

शहर

 हर
 शहर  की अप नी खुशबू   होती हैं
 कोई शहर मन को उदास कर देता  हैं 
 कोई उदास  मन को  सुक़ून  देता   हैँ 
 
 हर शहर की  अपनी मिटटी  होतीं  हैँ 
 कोई मिटटी  बंजर जमीन सी सिसकती हैं 
 कोई मिटटी  लहलहाती  हैं  फूलोँ की  खुश्बु  से 

 हर शहर का  अपना  सँगीत होता  हैं 
 कोई सरगम  सा बजता हैं  कानो में 
 कोई गाडियों के हॉर्न सा चीखता हैं 


  हर शहर  का अपनी जिन्दगी होती हैं 
 कही  जिया जाता हैं हर लम्हा 
 कही दौड़ लगायी जाती लम्हे के लिय 


 हर शहर हसीन होता हैं एक कशिश लिय 
 कोई अपना शहर होता   हैं हसीन  सा 
 कोई अपनों का  शहर होता हैं कशिश लिय हुए 


 नीलिमा शर्मा  निविया 
आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

5 टिप्‍पणियां: