गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

जिन्दगी

जिन्दादिली से
जीना हैं
जिन्दगी को
जो मिलती हैं
ख्वाब सी 
खुशबू
अभी तलक
उस् में
अहसास की
उम्र हैं कि
महक रही हैं
नफासत से
जिसे भूल गयी
जिन्दगी की किताब में
रखकर
महसूस हो रही हैं
गुलाब के इत्र सी
फिजाओं में
मौसम में आते बदलाव सी
नीलिमा शर्मा निविया



आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

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