गुरुवार, 3 सितंबर 2015

अनचाहे ही अनजाने में








कुछ राते बहुत उदास कर जाती हैं
अनचाहे ही अनजाने में
और टूट जाते हैं नजरिये
इक दुसरे को देखने के
मलामत दिल में
मलिनता दिमाग में
नासमझी से नकारते
दुसरे के वजूद को
मुफ्त की नसीहत देते
भीतर तक महसूसते
अपने ही खोखलेपन को
धाराप्रवाह निर्गल प्रलाप से
बहुत कुछ समझते कुछ चेहरे
कुछ आईने टूट कर ही
चुभते हैं ,साबुत भी
कभी मुकम्मल तस्वीर न थे जो
कभी बेचारगी कभी मासूमियत
कभी मक्कारी का मुखोटा ओढ़े
यह आईने कई चेहरे लिय
उम्र भर तलाशते अपना वजूद
और इक छायाप्रति तक न पाकर
बिलबिला उठते अंधेरो में
जिस्म मिटटी का लेकिन
सोच कीचड़ की कर्म शुद्रिय
जिन्दगी भर फूटे घड़े से
अचानक भरकर बरसाती काई से
दिन को सुनहरा धुप सा पाकर
भूल जाते रात के अंधेरो को
बरसती सीलन भरी बरसातो को
और भयावह बनाते हैं
उनीदी रातो को
कुछ राते बहुत उदास कर जाती हैं
अनचाहे ही अनजाने में
और टूट जाते हैं नजरिये
इक दुसरे को देखने के
नीलिमा शर्मा निविया




















आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (05-09-2015) को "राधाकृष्णन-कृष्ण का, है अद्भुत संयोग" (चर्चा अंक-2089) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तथा शिक्षक-दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं