सोमवार, 2 नवंबर 2015

मढ़ीयो के जलते दिवे

उम्र  कब की  बरस कर खामोश  हो गयी 
 आँखे भी मुस्कुराती  आखिर कब तलक  
  मन था जो भीग कर  मिटटी    गीली सा 
 नफासत से जीती  रही  लाल ओढ़नी  तब तलक  


  सफ़ेद  रंग था  सिरहाने बिछा हुआ सा 
 आसमा स्याह  भी नीला रहता कब तलक 
  उसकी चूड़ियाँ भी  खनकती  कैसे  अब 
  सिलवटो  सी  रहती  चादर     जब तलक 


 खुशनुमा  पलो को भर बुक्कल में  अपनी 
  सुनहरी  रेत सा झरने से बचाती  कब तलक 
 शिकवे भी करती तो कब और  किस'से करती   
 उसकी दुआ जब कभी पहुँचती नही रब तलक 


  मढ़ीयो  के जलते दिवे  के चारो तरफ 
   फेरे भी कितने लगाती और कब तलक 
 रूठ्या  माहि   भी जा बैठा    ऊँचे बनेरे 
     आवाज़  भी  नही  जाती  सिसकियो की सब   तलक 



आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

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