रविवार, 2 जून 2013

बहुत आत्म मुग्धा हो रही हूँ

मेरे हर प्रेम निवेदन के
आक्रोश के
संतोष के
विक्षोभ के
केंद्र में तुम रहते हो
एक बिंदु की तरह तुम
स्थिर रहते हो अपने स्थान पर
और मैं भिन्न भिन्न कोणों से
तुम पर व्यक्त करती हूँ अपने सारे भाव
और तुम अटल से अडिग रहते हो
अपनी परिधि पर
मैं कभी त्रिभुज मैं कभी वर्गाकार सी
घेरे रखती हूँ तुम्हे अपने सवालो से
तुम निर्मय भी हो मेरे जीवन के रेखागणित की
तो प्रमेय भी
मेरा हर समय तुम्हे कटघरे मैं खड़े कर देना
तुमको आत्मसात होता होगा
परन्तु हर प्रीत /आक्रोश समर के पश्चात्
मुझे आत्म ग्लानी होती हैं
अपने शब्दों पर
मैं शर्मिंदा हो जाती हूँ
तुम्हारी धीरता से
आडिगता से
सुनो न
कभी मुझे भी केंद्र बिंदु मैं रखो
अपने सवालों के
आरोपों-प्रत्यारोपो के
केंद्र में
और घुमाओ मुझे भी इस परिधि पर
मुझे भी आत्म विवे चना करने दो
बहुत आत्म मुग्धा हो रही हूँ मैं .............................

14 टिप्‍पणियां:

  1. nice and so good "ek sthirpragya kya vartmar main hain ?

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  2. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति....

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  3. आपकी यह रचना निर्झर टाइम्स (http://nirjhar-times.blogspot.in) पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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