शुक्रवार, 21 जून 2013

एक अदद कफ़न भी न मयस्सर हुआ सैलाब से

बक्सा भरा था जिसका कीमती रुपहले कपड़ो से 
एक अदद कफ़न भी न मयस्सर हुआ सैलाब से
~~~

फूलो की तरह पाला/चाहा था जिस माँ ने 
बेटा माला तक न पहना पाया उस देह को
~~~~

कितने चाव से बनाया था बेटी की शादी का जोड़ा
हाथ कन्या दान से पहले प्रलय ने छुड़ाया हैं क्यों

~~~~~
कहती थी मेरी उम्र भी तुम्हे लग जाए व्रत करती हूँ
सच करके आज अपने शब्दों को देखाया उसने

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  2. उफ़्फ़...अत्यनात मार्मिक एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं
  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन इस दुर्दशा के जिम्मेदार हम खुद है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी यह रचना कल शनिवार (22 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही दर्दनाक! मार्मिक!

    उत्तर देंहटाएं