सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

चीखे !!

चीखे !! चिल्लाहटे!!! रूदन !! कराहटे!! मोहताज़ नही किसी ध्वनि की हृदय के किसी अंदरूनी कोने में भी घर बना लेती हैं कभी चुपचाप !! दर्द वेदना पीड़ा हर बार बयां हो संभव नही चेतना भी छिपा लेती हैं इनको भीतर अपने हर बार कई बार
आँखे अक्सर वोह कहती हैं जो लब छिपा जाते हैं लब अक्सर वोह कहते हैं जो आँखे बहा ले जाती हैं

18 टिप्‍पणियां:

  1. इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-29/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -36 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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  2. इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-29/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -36 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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  3. आँखे अक्सर वोह कहती हैं
    जो लब छिपा जाते हैं
    लब अक्सर वोह कहते हैं
    जो आँखे बहा ले जाती हैं
    आपकी लेखनी तो गज़ब का जादू जानती है

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  4. गहन ..... व्यथा को सधे शब्दों में उकेरा है .....

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  5. व्यथा कई रूप लेती है ,कभी चीख तो कभी आंसू ---बहुत सुन्दर
    नई पोस्ट सपना और मैं (नायिका )

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  6. इस खामिशी की आवाज़ कभी कभी बहरा कर देती है ...
    बाहर गहरा एहसास छोड़ते शब्द ..

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