मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

एक टुकड़ा धूप



एक कोना 
अपना 
जिसमें 
छुपाये हैं 
मैंने 
ना जाने 
कितने
पुलकित क्षण
द्रवित मन
आंसुओ की बारिश
दोस्तों की साजिश
अकेलेपन की यादे
मिलन की बाते
,
,
,
आज वोह कोना
बगावत कर रहा हैं
उसे भी साथ
चाहिए
उसके भीतर की
सीलन को भी
एक टुकड़ा धूप चाहिए
नीलिमा शर्मा निविया





















आपका सबका स्वागत हैं .इंसान तभी कुछ सीख पता हैं जब वोह अपनी गलतिया सुधारता हैं मेरे लिखने मे जहा भी आपको गलती देखाई दे . नि;संकोच आलोचना कीजिये .आपकी सराहना और आलोचना का खुले दिल से स्वागत ....शुभम अस्तु

2 टिप्‍पणियां:

  1. अभी चाहत है धूप की ..... धूप के बाद फिर चाहत होगी बारिश की ,फिर शीत की फिर धूप की ..... चाहत का क्या
    मौसम प्रकृति बदलती है ..... मन की प्रकृति चाहत .....

    उत्तर देंहटाएं
  2. उसे भी साथ
    चाहिए
    उसके भीतर की
    सीलन को भी
    एक टुकड़ा धूप चाहिए

    dil ko chhoo gai rachna

    shubhkamnayen

    उत्तर देंहटाएं